Thursday, November 1, 2007

श्री हनुमान चालीसा

जय हनुमान ग्यान गुन सागर जय कपिश तुही लोक उजागर"

श्री गुरु चरण सरोज राज, निज मन मुकर सुधारी,
बर्नाऊ रघुवर बिमल जसु, जो दायकु फल चारी

बूढी हीन तनु जानिके, सुमिरो, पवन कुमार,
बल बुदधी वीद्या देहु मोही, हरहु कलेश बिकार


श्री हनुमान चालीसा


जय हनुमान ग्यान गुन सागर
जय किपीस तिहुँ लोक उज्गार


रामदूत अतुलीत बल धामा,
अंजनी पुत्र पवनसुत नामा.


महाबीर बीक्रम बजरंगी,
कुमती नीवार सुमती के संगी.


कंचन बरन बिराज सुबेसा,
कानन कुंडल कुंचित केसा.


हाथ बज्र और ध्वजा बीराजे,
कंधे मूंज जनेऊ साजे.



शंकर सुवन केसरी नंदन,
तेज प्रताप महा जग वंदन.


विद्यावान गुनी अती चातुर,
राम काज करीबे को आतुर



प्रभु चरित्तर सुनावे को रसिया,
राम लखन सीता मन बसीया.



सुक्ष्म रूप धरी सीहयी दिखावा,
बिकट रूप धरी लंक जरावा



भीम रूप धरी असुर संहारे,
रामचंद्र के काज सवार.



लाये सजीवन लखन जियाये,
श्री रघुबीर हरषी उर लाये.



रघुपती किन्ही बहुत बढाई,
तुम मम प्रीय भारत सम भाई.


सहस्त्र बदन तुम्हारो जस गावे,
अस कही श्रीपती कंठ लागावे.


सनकादिक ब्रह्मादी मुनीसा,
नारद सरद सहित अहीसा



जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते,
कबी कबिद कहीं सके कहाँ ते


तुम उपकार सुग्रीवन कीन्हा,
राम मिलाई राजपद दीन्हा



तुम्हारो मंतर वीभीषण माना,
लंकेश्वर भये सब जग जाना.


जुग सहस्त्र जोजन पर भानु,
लील्यो ताही मधुर फल जानू



प्रभु मुद्रिका मेली मुख माहीं,
जल्धी लांघी गए अचरज नहीं.


दुर्गम काज जगत के जेते,
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते.


राम दुवारे तुम रखवारे,
होत न आग्या बीन पैसारे.


सब सुख लहें तुम्हारी सरना,
तुम रक्छक काहू को डरना.


आपन तेज सम्हारो आपे,
तीनो लोक हांक ते कांपे



भूत पीसाच निकट नही आवे,
महाबीर जब नाम सुनावे.


नासे रोग हरे सब पीरा,
जपत निरंतर हनुमंत बीरा



संकट ते हनुमान छुडावे,
मन क्रम बचन ध्यान जो लावे.



सब पर राम तपस्वी राजा,
तिनके काज सकल तुम साजा



और मनोरथ जो कोई लावे,
सोई अमीत जीवन फल पावे.


चारो जुग परताप तुम्हारा,
है परसिद्ध जगत उजियारा.


साधो संत के तुम रखवारे,
असुर निकंदन राम दुलारे.



अष्ठ सिद्धी नौ नीधी के दाता,
अस बर दीन जानकी माता.


राम रसायन तुम्हरे पासा,
सदा रहो रघुपती के दासा.



तुम्हरे भजन रामको पावे.
जनम जनम के दुःख बिस्रावे.


अंत काल रघुबर पुर जाई,
जहाँ जन्म हरी भक्ती कहाई.


और देवता चित्त न धरई,
हनुमंत सेई सर्व सुख करई


संकट कटे मीटे सब पीरा,
जो सुमीरे हनुमंत बलबीरा



जय जय जय हनुमान गोसाई
कृपा करहु गुरुदेव की नाई


जो सत बार पाठ कर कोई,
छुतही बंदी महा सुख होई.


जो यह पढे हनुमान चालीसा,
होय सिद्धी साखी गौरीसा


तुलसीदास सदा हरी केरा,
कीजे नाथ ह्रदय मह डेरा.



चोपाई

पवन तनय संकट हरण, मंगल मूर्ती रूप.
राम लखन सीता सहीत, ह्रदय बसहु सुर भूप.



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